बेशक बिहार विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी के हाथ को आम आदमी का साथ न मिल सका हो पर उत्तर प्रदेश कांग्रेस पार्टी ने यूपीए अध्यक्ष सोनिया और युवराज राहुल को अभी भी पार्टी ब्रांड बनाया हुआ है। हाल ही में कांग्रेस की 125 वीं सालगिरह के अवसर पर लगाए गए पोस्टरों में सोनिया गांधी को 'माता इंडियाÓ और कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को 'भगवान श्रीकृष्णÓ के रूप में दिखाया गया है। इन पोस्टरों इलाहाबाद की गली-मुहल्लों को पाट दिया गया । इन पोस्टरों का भारतीय जनता पार्टी सहित सपा ने भी जमकर विरोध दर्ज कराया है। भाजपा ने कांग्रेस को हिन्दू देवी-देवताओं को अपमानित करने वाली पार्टी करार दिया है।
कांगे्रस की 125 वीं सालगिरह के अवसर पर इलाहाबाद में सोनिया गांधी की एक रैली आयोजित की गयी थी जिसमें सोनिया और राहुल गांधी के लगे पोस्टरों से पूरे शहर को पाट दिया गया। यह रैली 2012 में होने वाले विधानसभाओं चुनावों को टारगेट करते हुए आयोजित की गयी थी। रैली में लगाए गए पोस्टरों का भारतीय जनता पार्टी ने जमकर विरोध किया। जिसके चलते कार्यकर्ताओं पर लाठियां तक बरसाई गई। वहीं समाजवादी पार्टी ने अपने विरोध स्वरुप काले झंडा दिखाए।
बीजेपी के वरिष्ठ नेता केसरीनाथ त्रिपाठी ने कहा कि इन पोस्टरों से यही साबित होता है कि कांग्रेस में चमचावाद चरम पर है और मां-बेटे को खुश करने के लिए ही यह सारा खेल किया गया है। इन पोस्टरों के माध्यम से पार्टी को सियासी लाभ पहुंचाने की कवायद स्थानीय नेताओं ने की है। लेकिन लाभ के लिए उठाया गया यह कदम कांग्रेस के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। जैसा की हाल ही में बिहार विधानसभा चुनावों में पार्टी को करारी हार मिली है। जहां पार्टी को पिछले चुनावों में 10 सीटें मिली थी वहीं इस बार केवल 4 सीटें ही मिल सकी। लगता है बिहार चुनावों में मिली इस करारी हार से कुछ सबक लेते हुए पार्टी ने अभी से कमर कस ली है। इसके लिए इलाहाबाद में आयोजित की गयी रैली में सोनिया गांधी ने पार्टी कार्यकर्ताओं से आम लोगों को साथ लेकर आंदोलन में उतरने का निर्देेश दिए। साथ ही केंद्र की योजनाओं को आम आदमी तक पहुंचाने को कहा गया। रैली में जुटी भीड़ को देखकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया उत्साहित नजर आईं। उन्होंनेे रैली में बोलते हुए माया सरकार पर केंद्र से मिले पैसे का सही उपयोग न करने का आरोप लगाया।
कांग्रेस पार्टी के स्टार प्रचारक और यूथ आइकॉन राहुल गांधी का बिहार में कुछ जादू नहीं चल सका। जबकि राहुल गांधी को पार्टी के खेवनहार के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। लगता है बिहार के युवा राहुल की रणनीति और उनकी छवि से प्रभावित नहीं हो पाये। आलम यह रहा कि जहां-जहां राहुल गांधी ने पार्टी उम्मीदवारों के समर्थन में रैलियां एवं सभाएं की थी वहां उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के बल पर विधानसभा पहुंचने का सपना देख रहे प्रत्याशियों का सपना चकनाचूर हो गया।
कांग्रेसी नेता मणि शंकर अय्यर ने जेडीयू नेता नीतिश कुमार की जीत को महिला वोट बैंक से मिली जीत बताया है। उनका कहना है कि नीतिश को केवल बिहार की महिलाओं ने जिताया है। लगता है बिहार की महिलाओं का विश्वास केवल नीतीश में ही है। नीतिश ने बिहार के विकास में जो कार्य किए गए है उनको देखते हुए महिलाओं ने प्रदेश की उन्नति, समृद्धि और कानून के लिए केवल मौजूदा सरकार को ही उपयुक्त पाया है। इसलिए सरकार को पहले से अधिक सीटें प्राप्त हुई है। इन चुनावों में यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की रैलियों और सभाओं को बिहार की जनता और खासकर महिलाओं पर कुछ खास असर नहीं दिख सका। इन चुनावों महिलाओं ने आगे बढ़कर अपने मताधिकार का उपयोग किया है। इलेक्शन कमीशन के अनुसार इस बार बिहार विधानसभा चुनावों में महिलाओं ने 54.85 फीसदी मतदान किया। जो कि 2005 में हुए विधानसभा चुनावों से 10 प्रतिशत अधिक है। मौजूदा आंकड़ा 2009 में हुए लोकसभा चुनाव की तुलना में 12 प्रतिशत ज्यादा है। प्रदेश के यूथ वर्ग ने भी मौजूदा सरकार में ही अपना विश्वास दिखाया है। बिहार विधानसभा चुनाव में जेडी(यू)-बीजेपी गठबंधन की जीतने यूथ के चेहरे पर भी मुस्कान ला दी है। युवाओं को अब एजूकेशन और जॉब के लिए घर छोडऩा नहीं पड़ेगा। इस बार बिहार की वोटिंग जातिवादी और धर्म विशेष को आधार न मानते हुए विकासवाद के आधार पर हुई है। जो प्रदेश के साथ-साथ सम्पूर्ण देश के लिए एक गौरव की बात है। काश! बिहार की तरह अन्य प्रदेश के लोग भी जातिवादी और स्वार्थसिद्धि की राजनीति छोड़कर केवल विकास देने वाली सरकार को चुनें तो देश से शीघ्र ही बेरोजगारी, अशिक्षा, हिंसा और भ्रष्टाचार जैसी गंभीर समस्याएं दूर हो जाएगी और सब लोगों को रोटी कपड़ा और मकान आराम से मिल सकेगा।
इसे आप भगवान की कृपा कहे या अपना - अपना नसीब की, किसी के पास इतना पैसा, सुख- सुविधा है की उसे समय ही नहीं की वह अपने सम्पति और माया का हिसाब रख सके और दूसरी तरफ ऐसे भी लोग है जिनका रोज़ खाना और रोज़ कमाना होता है. अगर उनकी कमाई नहीं हुई तो उन्हें खाना भी नहीं मिल पाता. जाने... ये विवशता और मजबूरी कब समाप्त होगी और कब सब लोग सामान होंगे . आखिर कब आएगी समानता.... ???
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Friday, November 26, 2010
Monday, October 18, 2010
जम
गाजियाबाद। गाजियाबाद जिसे सभी लोग हॉटसिटी के नाम से जानते है और बहुत से लोग इसकी पहचान छोटी दिल्ली कहकर भी कराते है। यह शहर प्रदेश सरकार को राजस्व देने वालों सर्वाधिक शहरों में से एक है। गाजियबाद शहर की महत्व को इसी बात से जाना जा सकता है भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने इसी को अपना चुनावी क्षेत्र बनाया। परंतु इस शहर में कानून व्यवस्था नाममात्र की है। जबकि बसपा सु्रपीमों मायावती ने अपने चुनावी घोषणा में कानून व्यवस्था को कायम करने और रोजगार देने की गारंटी प्रदेश की जनता को दी थी।
कानून व्यवस्था की बात करे तो प्रदेश की पुलिस जनता की रक्षा और सुरक्षा को दरकिनार कर केवल और केवल अपने निजी स्वार्थों में लगी हुई है। जहां देखों पुलिस की गुंडागर्दी, घूसखोरी, निकम्मापन देखने को मिलता है। जहां पुलिस किसी भी दबंग एवं सम्पन्न व्यक्ति की जी हुजुरी करने में थकती नहीं है वहीं किसी गरीब व्यक्ति पर अपना रौब दिखाने से भी नहीं चूकती। गरीब पर अपना रौब दिखाने के बाद उससे जो भी निकाल सके उसे भी लेेने में पीछे नहीं हटती।
पुलिस की लापरवाही और निकम्मेपन को आप किसी भी चौराहे पर कभी भी देख सकते है। जहां पूरे शहर में जाम की एक भयंकर और विकराल समस्या बना हुआ है। यह जाम पुलिस की लापरवाही और अपने कार्य के प्रति निष्ठा की कमी का ही दुष्परिणाम है। शहर के किसी भी चौराहे पर जाम लगा होने पर पुलिसकर्मी वहीं किसी कोने में खड़े होकर आपस में गप्पे लडाने में मशगूल होते है या अपनी कमाई करने ेंमें। परंतु जाम को खुलवाने के लिए कोई कर्मी जल्दी से आगे नहीं आता है। कोई भी पुलिस कर्मी या पुलिस अधिकारी या प्रशासनिक अधिकारी किसी भी चौराहे पर लगे टे्रफिक सिग्नलों के सुचारु रुप से चलने की तरफ ध्यान नहीं देता। शहर के तमाम प्रशासनिक अधिकारी और नेता इन चौराहों से होकर ही आते-जाते है परंतु सिग्नलों के सही ढंग से काम करने की तरफ किसी का भी ध्यान नहीं जाता है। जनप्रतिनिधि और कोई भी संस्था जो जनता की सभी परेशानियों और उलझनों को दूर करने का दम भरते है वे भी इस ओर से आंखें मूंदे बैठे है।
कोई भी पुलिस कर्मी या अधिकारी यातायात के नियमों का पालन करने के लिए नहीं कहता। पुलिस अफसर या कर्मी के सामने से आप किसी रांग साइड से आइए कोई भी नहीं रोकता। जिसका दुष्परिणाम यह हुआ कि आजकल अपनी साइड छोडकर दूसरे की साइड में चलने का चलन सा निकल पडा है। किसी भी क्रॉसिंग या चौराहे पर सभी को एक दूसरे से पहले निकलने की जल्दी होती है। और इसी जल्दी के चक्कर में आए दिन टैफिक सिग्नलों के हिसाब से कोई नहीं चलता है जिस कारण जाम और दुर्घटनाएं होती है।
पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी यातायात के नियमों के प्रति स्वयं जागरुक होकर शहर की जनता को जागरुक करने के लिए एक अभियान चलाए। जिससे शहर में आए दिन होने वाली दुर्घटनाओं में कमी आ सके और इन पर काबू पाया जा सके। शासन-प्रशासन के द्वारा जनता को टे्रफिक सिग्नलों का पालन करने के लिए जाग्रत किया किए जाने की आवश्यकता है।
कानून व्यवस्था की बात करे तो प्रदेश की पुलिस जनता की रक्षा और सुरक्षा को दरकिनार कर केवल और केवल अपने निजी स्वार्थों में लगी हुई है। जहां देखों पुलिस की गुंडागर्दी, घूसखोरी, निकम्मापन देखने को मिलता है। जहां पुलिस किसी भी दबंग एवं सम्पन्न व्यक्ति की जी हुजुरी करने में थकती नहीं है वहीं किसी गरीब व्यक्ति पर अपना रौब दिखाने से भी नहीं चूकती। गरीब पर अपना रौब दिखाने के बाद उससे जो भी निकाल सके उसे भी लेेने में पीछे नहीं हटती।
पुलिस की लापरवाही और निकम्मेपन को आप किसी भी चौराहे पर कभी भी देख सकते है। जहां पूरे शहर में जाम की एक भयंकर और विकराल समस्या बना हुआ है। यह जाम पुलिस की लापरवाही और अपने कार्य के प्रति निष्ठा की कमी का ही दुष्परिणाम है। शहर के किसी भी चौराहे पर जाम लगा होने पर पुलिसकर्मी वहीं किसी कोने में खड़े होकर आपस में गप्पे लडाने में मशगूल होते है या अपनी कमाई करने ेंमें। परंतु जाम को खुलवाने के लिए कोई कर्मी जल्दी से आगे नहीं आता है। कोई भी पुलिस कर्मी या पुलिस अधिकारी या प्रशासनिक अधिकारी किसी भी चौराहे पर लगे टे्रफिक सिग्नलों के सुचारु रुप से चलने की तरफ ध्यान नहीं देता। शहर के तमाम प्रशासनिक अधिकारी और नेता इन चौराहों से होकर ही आते-जाते है परंतु सिग्नलों के सही ढंग से काम करने की तरफ किसी का भी ध्यान नहीं जाता है। जनप्रतिनिधि और कोई भी संस्था जो जनता की सभी परेशानियों और उलझनों को दूर करने का दम भरते है वे भी इस ओर से आंखें मूंदे बैठे है।
कोई भी पुलिस कर्मी या अधिकारी यातायात के नियमों का पालन करने के लिए नहीं कहता। पुलिस अफसर या कर्मी के सामने से आप किसी रांग साइड से आइए कोई भी नहीं रोकता। जिसका दुष्परिणाम यह हुआ कि आजकल अपनी साइड छोडकर दूसरे की साइड में चलने का चलन सा निकल पडा है। किसी भी क्रॉसिंग या चौराहे पर सभी को एक दूसरे से पहले निकलने की जल्दी होती है। और इसी जल्दी के चक्कर में आए दिन टैफिक सिग्नलों के हिसाब से कोई नहीं चलता है जिस कारण जाम और दुर्घटनाएं होती है।
पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी यातायात के नियमों के प्रति स्वयं जागरुक होकर शहर की जनता को जागरुक करने के लिए एक अभियान चलाए। जिससे शहर में आए दिन होने वाली दुर्घटनाओं में कमी आ सके और इन पर काबू पाया जा सके। शासन-प्रशासन के द्वारा जनता को टे्रफिक सिग्नलों का पालन करने के लिए जाग्रत किया किए जाने की आवश्यकता है।
Monday, December 14, 2009
जनता की चाहे विकास की राहा
आज हमारे सामने देश में नए -नए राज्यों की मांग उठ रही है ये मांग तेलगाना राज्य की मांग को केन्द्र सरकार से मंजूरी की भनक मिलने के बाद उठी है। काफी समय से जो आन्दोलन शांत थे उन सब में फिर से एक नई चिंगारी जल उठी है । देश में नए राज्यों की मांग में पूर्वाचल , बुंदेलखंड, वेस्ट उत्तर प्रदेश , सोराष्ट, गोरखालैंड , आदि सामिल है। सब की पीछे मांग का आधार विकास को रखा गया है । तर्क ये है की बड़े एरिया होने के कारन विकास नही हो पाता।
मेरा माना है की विकास छोटे या बड़े राज्य के आधर पैर नही होता । विकास होता है सरकार की नीतियों से और जनता के सहयोग से । और सरकार की नीतियों को बनाने के बाद उन पर सही और प्रभावी ढंग से अमल से । जब तक सरकार और नौकरशाही पुरी ईमानदारी के साथ विकास की नियत से अपना काम नही करगी तब तक विकास नही हो सकता ।। चाहे आप विकास के नाम पर पुरे देश के छोटें - छोटें टुकडे क्यों न कर दे। इसलिऐ पहले नौकर शाही और सरकार की जवाव देही के लियें नियम शक्त किए जाय। आप एक छोटा सा उदाहरण किसी ऐसे चोराहें की ले जहा पुलिस कर्मी की ड्यूटी हो। आप अक्सर देखेंगे की पुलिस सड़क पर लगे जाम को हटाने की बजाय आपसी गुफ्तगू में या आराम करने में व्यसत होंगे।
मेरा माना है की विकास छोटे या बड़े राज्य के आधर पैर नही होता । विकास होता है सरकार की नीतियों से और जनता के सहयोग से । और सरकार की नीतियों को बनाने के बाद उन पर सही और प्रभावी ढंग से अमल से । जब तक सरकार और नौकरशाही पुरी ईमानदारी के साथ विकास की नियत से अपना काम नही करगी तब तक विकास नही हो सकता ।। चाहे आप विकास के नाम पर पुरे देश के छोटें - छोटें टुकडे क्यों न कर दे। इसलिऐ पहले नौकर शाही और सरकार की जवाव देही के लियें नियम शक्त किए जाय। आप एक छोटा सा उदाहरण किसी ऐसे चोराहें की ले जहा पुलिस कर्मी की ड्यूटी हो। आप अक्सर देखेंगे की पुलिस सड़क पर लगे जाम को हटाने की बजाय आपसी गुफ्तगू में या आराम करने में व्यसत होंगे।
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